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भिक्षु का नहीं, ‘आलोक’ का भी था इंतजार: विश्व शांति यात्रा का चर्चित साथी पहुंचा बोधगया

वियतनामी-अमेरिकी बौद्ध भिक्षु पन्नकारा थेरो शुक्रवार को बोधगया पहुंचे हैं, लेकिन इस बार लोगों की नजर सिर्फ भिक्षु पर ही नहीं बल्कि उनके खास साथी ‘आलोक’ पर भी है। यह वही भारतीय देसी नस्ल का कुत्ता है, जो एक पदयात्रा के दौरान भिक्षुओं के साथ जुड़ा और आज विश्व शांति व करुणा का प्रतीक बन चुका है।

बताया जाता है कि नेपाल और भारत में 112 दिवसीय धुतांग यात्रा के दौरान कोलकाता से बोधगया की ओर पदयात्रा करते समय एक आवारा कुत्ता भिक्षुओं के साथ चलने लगा। उसकी निष्ठा और लगाव को देखकर भिक्षु पन्नकारा थेरो ने उसे अपने साथ रख लिया और उसका नाम ‘आलोक’ रखा। धीरे-धीरे वह यात्रा दल का अभिन्न हिस्सा बन गया।
इसके बाद आलोक ने हजारों किलोमीटर लंबी कई शांति यात्राओं में भिक्षुओं का साथ दिया। वह अमेरिका तक पहुंचा और वहां आयोजित लगभग 3,500 किलोमीटर लंबी विश्व शांति पदयात्रा में भी चर्चा का विषय बना। आज आलोक दुनिया भर के बौद्ध अनुयायियों के बीच करुणा, मित्रता और सह-अस्तित्व का प्रतीक माना जाता है।
जब पन्नकारा थेरो महाबोधि मंदिर पहुंचें, तब उनके साथ आलोक भी मौजूद रहा। बोधगया आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए यह विशेष आकर्षण का केंद्र बना।
भिक्षु पन्नकारा थेरो और उनके साथी भिक्षुओं का दल बोधगया से आगे कुशीनगर और लुंबिनी की यात्रा भी करेगा। इस दौरान वे विश्व शांति, जागरूकता और करुणामय प्रेम का संदेश फैलाएंगे। वहीं आलोक की मौजूदगी इस संदेश को और अधिक जीवंत बनाती है, क्योंकि उसकी कहानी बताती है कि करुणा और अपनापन किसी भी जीव को असाधारण बना सकता है